रुपया 90 के पार — भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका
Rupee Record Low 2025: भारतीय रुपया दिसंबर 2025 में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया है। पहली बार एक डॉलर का भाव 90 रुपये के पार निकलने की खबर ने बाजारों में हलचल मचा दी है। निवेशक, कारोबारी और आम लोग—सभी इस गिरावट को लेकर चिंतित हैं। यह ऐसी स्थिति है जो सीधे तौर पर महंगाई, विदेशी निवेश, आयात और शेयर बाजार पर प्रभाव डाल सकती है।

रुपया पिछले कई महीनों से दबाव में चल रहा था, लेकिन 90 के स्तर को पार करना भारतीय मुद्रा के लिए एक मनोवैज्ञानिक और आर्थिक झटका माना जा रहा है। इस गिरावट ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या आने वाले महीनों में डॉलर और मजबूत होगा? क्या भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका बड़ा असर पड़ेगा? और सबसे महत्वपूर्ण, आम आदमी की जेब पर इसका क्या असर देखने को मिलेगा?
डॉलर इतना मजबूत क्यों हुआ और रुपया कमजोर कैसे पड़ा?
डॉलर की मजबूती और रुपये की गिरावट कई घरेलू और वैश्विक कारणों का परिणाम है। सबसे पहले, अमेरिकी फेडरल रिज़र्व द्वारा ब्याज दरों को ऊंचा बनाए रखने का फैसला वैश्विक निवेशकों को अमेरिका की ओर आकर्षित कर रहा है। जब निवेशक अमेरिकी बॉन्ड और बाजारों में ज्यादा निवेश करते हैं, तो डॉलर की मांग बढ़ती है और बाकी मुद्राएं कमजोर पड़ने लगती हैं।
दूसरा बड़ा कारण है कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी। भारत तेल का सबसे बड़ा आयातक देशों में से एक है, और जैसे-जैसे कच्चा तेल महंगा होता है, भारत को अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इसका सीधा असर रुपये के मूल्य पर पड़ता है। दिसंबर 2025 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रही, जिसने रुपये पर दबाव बढ़ाया।
तीसरा मुद्दा है कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव—मध्य पूर्व में अस्थिरता, एशिया में बढ़ते तनाव और विश्व अर्थव्यवस्था में धीमापन—सब मिलकर उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं को कमजोर कर रहे हैं। भारतीय रुपया भी इसी दबाव का हिस्सा बन गया।
रुपये की गिरावट से महंगाई कैसे बढ़ेगी?
जब डॉलर मजबूत और रुपया कमजोर होता है, तो भारत में आयात महंगा हो जाता है। भारत इलेक्ट्रॉनिक सामान, कच्चा तेल, गैस, मशीनरी, मेडिकल उपकरण और कई जरूरी वस्तुएं आयात करता है। रुपये के 90 के पार जाने का मतलब है कि इन सभी आयातित चीजों की कीमत बढ़ेगी।
सबसे पहले असर पेट्रोल और डीज़ल पर पड़ेगा। अगर तेल कंपनियों को कच्चा तेल महंगा मिलेगा, तो पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों में बढ़ोतरी लगभग तय है। इसका सीधा असर ट्रांसपोर्ट, लॉजिस्टिक्स और रोजमर्रा की चीजों पर पड़ता है। महंगाई धीरे-धीरे हर क्षेत्र में फैलने लगती है—खाद्य वस्तुओं से लेकर इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स तक।
स्मार्टफोन, लैपटॉप, कैमरा, कार के पार्ट्स जैसे आइटम जो आयात पर निर्भर हैं, उनकी कीमतें भी बढ़ने की संभावना है। यह आम आदमी की जेब पर सीधा बोझ डाल सकता है।

शेयर बाजार और निवेश पर क्या असर दिखेगा?
रुपये की गिरावट शेयर बाजार के लिए मिश्रित संकेत देती है। आईटी और फार्मा जैसी कंपनियां, जो अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा विदेशों से डॉलर में लाती हैं, उनके लिए यह स्थिति फायदेमंद हो सकती है। इनके शेयरों में तेजी देखी जा सकती है।
लेकिन आयात-निर्भर सेक्टर—जैसे ऑटोमोबाइल, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरलाइंस और मैन्युफैक्चरिंग—इनके लिए यह गिरावट नुकसानदायक है। उच्च आयात लागत के कारण इन सेक्टरों की कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर शेयर बाजार के सेंटीमेंट और निवेशकों की रणनीति पर भी पड़ता है।
एफआईआई (विदेशी निवेशक) रुपये के कमजोर होने पर भारतीय बाजार से पैसा निकालना शुरू कर देते हैं, जिससे बाजार और अस्थिर हो सकता है।
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क्या RBI आगे कदम उठाएगा?
रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) आमतौर पर रुपये में अत्यधिक गिरावट को रोकने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करता है। RBI डॉलर बेचकर रुपये की मांग बढ़ाने की कोशिश करता है। लेकिन यह लंबी अवधि का समाधान नहीं है।
RBI ब्याज दरों में बदलाव कर सकता है या लिक्विडिटी को नियंत्रित कर सकता है—लेकिन ऐसा कोई भी कदम महंगाई और आर्थिक विकास पर प्रभाव डालता है। इसलिए RBI के लिए रुपये को स्थिर करना आसान नहीं है, खासकर जब वैश्विक परिस्थितियां लगातार बदल रही हों।
आने वाले दिनों में क्या और गिर सकता है रुपया?
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर मजबूत बना रहा और भारत का आयात बिल बढ़ता रहा, तो रुपये पर और दबाव आ सकता है। हालांकि 90 का स्तर मनोवैज्ञानिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है, इसलिए सरकार और RBI दोनों इस स्तर से आगे नुकसान रोकने की कोशिश करेंगे।
लेकिन भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की कीमतें और वैश्विक आर्थिक संकेतक तय करेंगे कि आने वाले महीनों में रुपया कैसा प्रदर्शन करता है।





